कृष्ण लीला
प्रणाम दोस्तों हरी ॐ, राधे राधे | पिछली कथा में हमने देखा की किस प्रकार गोपियों ने हमारे कान्हाजी को फसाया | अब गांव निकट आ रहा था कृष्ण के तोह पसीने छूटने लग गए | अब बिचारे करे तो क्या करे फिर कुछ दुरी पर चलने के बाद एक गोपी ने खुद ही कहा कृष्ण से की अब तुम मटकी हमें देदो और चले जाओ | कृष्ण तोह बड़ी सोच में पड़ गए की ये गोपी ऐसा क्यों कह रही है | गोपी ने फिर कहा कृष्ण तुम चले जाओ और कल फिर मिलने आना हम तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगी | कृष्ण तो देखे ही जा रहे थे उस गोपी की ओर | बाकि की गोपिया उस गोपी को डाटने लग गयी | कृष्ण भी देख रहे है | तब उस गोपी ने कहा कृष्ण तुम जाओ न | फिर कृष्ण वहा से चले गए | बाकि की गोपियों ने बोला "क्या हुआ तुमने क्यों उसे जाने दिया | हमें उसे देखने का सुख तोह मिल रहा था न " तब उस गोपी ने कहा " हम अपने सुख के लिए अपने प्रेम दुखी कैसे देख सकते है | उसकी मज़बूरी का फायदा उठाते उठाते क्या उसकी कदर करना भूल जाये ? उसने तोह सदा हमारी लाज रखी और हम अपने प्रेम के आवेग में उसे दुःख दे | प्रेमी को सुख पोहचना ही प्रेम का लक्ष्य है | अगर गाव में जाने पर सब उसपर हसते तोह क्या अच्छा लगता तुम्हे ? वो तो प्रेम आधीन होकर सब कुछ सेह लेते पर इससे हमें क्या सुख मिलता नहीं न इसीलिए मैंने उसे भेज दिया | और मिलने का वचन भी ले लिया | " मित्रो प्रेम स्वार्थ नहीं परमार्थ | सुख लेना नहीं देना है | चलिए अगली पोस्ट में एक नयी कृष्ण लीला के साथ तब तक लिए हरी ॐ
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| राधा के कृष्ण |

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