नंदोस्तव
पिछले पोस्ट में हमने देखा वसुदेव जी कृष्ण को यमुना पार ले आये | वो कृष्ण को नन्द जी के यहाँ लेकर गए | माता यशोदा और समस्त गोकुल निद्रा में था | वसुदेव जी ने कृष्ण को यशोदा के बगल में लेटाया |
और यशोदा मैया के पास एक कन्या लेटी थी, जो योगमाया थी, उसे लेकर वह कारागृह में वापस लौट आये | अब जैसे ही योगमाया ने कारागृह में प्रवेश किया सारे बंधन पुनः लग गए | सैनिक सारे जग गए | कंस को पता चला की माता देवकी ने अपने आठवे पुत्र के रूप में एक कन्या को जन्म दिया है | वह दौड़ता हुआ आया और उस कन्या को मारने के लिए उसने पटकने की कोशिश की वह कन्या अंतरिक्ष में उड़ गयी और अष्टभुजा धारिणी देवी के रूप में प्रकट हो गयी और बोली," हे मुर्ख कंस मुझे मारने से तुझे कोई लाभ नहीं होगा, तुझे मारनेवाला तो कहि और जन्म ले चूका है, तू व्यर्थ माता देवकी को कष्ट न दे |"
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| योगमाया |
इधर नंदभवन में सब सो रहे थे, किसी को पता ही नहीं की लाला का जन्म हो चूका है, अब कृष्ण जी ये सोचे की इन सब को बताये कैसे की "हम यहाँ आ चुके है, मैया यशोदा का प्रेम पाने लिए तो हम तरस रहे है|" तभी उन्होंने अपने सबसे धारदार अस्त्र चलाया सबको जगाने के लिए और वो अस्त्र था रोने का अस्त्र | प्रभु जोर जोर से रोने लग गए | अब उनके रोने की आवाज से मैया यशोदा की नींद खुल गयी, माता यशोदा ने अपने उस प्यारेसे लल्ला को देखा उनके नेत्र अश्रुओ से भर गये | वो उसे गोद में उठाकर दुलार करने लग गयी | इसी बिच वहाँ नन्दबाबा भी पधारे और अपने पुत्र को देखकर निहाल हो गए | सारे गोकुल में ये बात फ़ैल गयी नन्द जी के घर में लाला आया है | सारा गोकुल इकठ्ठा हो गया उन्हें लाला के जनम की बधाई देने| नन्द जी के यहाँ तो जैसे कुबेर ने अपना धन खुला कर दिया हो, ऐसे नंदबाबा धन का दान कर रहे थे | लोग धन लेकर तो जा रहे थे किंतु लाला के दर्शनों के आगे वो धन भी तुच्छ लग था इसिलए कह रहे था, " बाबा धन बादमें दो पहले अपने लल्ला का मुखड़ा तो दिखा दो" और जैसे ही लल्ला का मुखड़ा देखा तो अपनी सुदबुद खोकर दान लेना भी भूल जाते थे ऐसा था उस मनमोहन का मुखड़ा| चहुओर ख़ुशीया ही ख़ुशीया थी| परंतु इन सभी खुशियों में माता रोहिणी अत्यंत दुखी थी, क्योंकि बलराम जी ने आखें नहीं खोली थी| नंदबाबा की विनती करने पर उन्होंने बलराम को कृष्ण के पालने में लेटाया और जैसे ही बलराम जी को कृष्ण का स्पर्श प्राप्त हुआ उन्होंने अपनी आखें खोली| दाऊभैया के आखें खोलने पर सारे वातावरण में प्रसन्नता फ़ैल गयी| लोग आनंदित होकर नाचने लग गए| कृष्ण के पिता नंदबाबा और राधा के पिता वृषभान जी एक दूसरे के अत्यंत घनिष्ट मित्र थे| उनमे पहले से ही यह तय हो चूका था की यदि हमारे घर में पुत्र पुत्री का जन्म हुआ तो हम उनका विवाह कराएँगे | कृष्ण के जन्मोस्तव पर वृषभानु जी भी वह पधारे और नन्दबाबा ने पूछा "कहो मित्र तुम्हे क्या चाहिए" उसपर वृषभान जी ने कहा, " तुम्हारा पुत्र चाहिए, हमारे वचन के अनुरूप मैं तुमसे तुम्हारे पुत्र का हाथ मांगने आया हूँ अपनी पुत्री राधा के लिए| " नंदबाबा ने कहा, "ये भी कोई पूछने की बात है, हमारा पुत्र तो तुम्हारा ही हैं, जाओ जाकर अपने जमाई के दर्शन कर लो और जल्द अपनी पुत्री को हमारे घर भेज दो| " और दोनों हसने लग गए|
उस दिन सभी देवी देवता कृष्ण के दर्शन करने नंदभवन पधारे|
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| नंदोस्तव |
हमने कृष्ण जन्म तो देख लिए अब बढ़ते है राधारानी की जन्म की तरफ | पिछले पोस्ट में हमने देखा था राधारानी कृष्ण से ग्यारह मास बड़ी थी | संत लोग कहते राधारानी के ये ग्यारह मास प्रतिक है ५ कर्मेंद्रियें, ५ ज्ञानेंद्रियें और मन के | जब तक इंसान इन सभीको वश में करके अपने आपको प्रभु को समर्पित नहीं होता, तब तक प्रभु उनके जीवन में प्रभु अवतार नहीं लेते | राधारानी सपर्पण का सर्वोच्च उदहारण है |
अब राधाकृष्ण की प्रथम भेंट देखेंगे अगली पोस्ट में, " जय सियाराम" " राधे राधे"


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