एकादशी
प्रणाम दोस्तो, आज का दिन अत्यंत पावन और पुनीत है । क्योंकि आज का दिन है एकादशी का, मेरे आराध्य भगवान श्री कृष्ण की सर्वप्रिय तिथी " एकादशी " । आप हम सभी जानते है एकादशी व्रत के विषय मे, पर बहुत कम जानते है। एकादशी व्रत का महिमा अगाध है, उसकी तुलना अन्य किसी व्रत से करना असंभव है । संत नामदेव, संत तुकाराम ऐसे महान संतो ने भी एकादशी व्रत का पालन एवं उसकी महिमा का वर्णन किया है । जो लोग एकादशी व्रत का नित्य श्रद्धापूर्वक पालन करते है , उस प्रभु की महिमा का गुणगान, नामजप निराहार होकर करते है उनके लिए प्रभु के ह्रदय के द्वार खुल जाते है । इस जीवन में हमे सर्वथा प्राप्त करनेयोग्य वस्तु है कृष्ण की भक्ति। भक्ती से बडी और कोई संपत्ति नही।और ये भक्ति जो लोग श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत का पालन करते है उन्हें सहज मिल जाती है । प्रभु उनपर सदैव प्रसन्न रहते है ।आजकल के लोग व्रत और उपवास में अधिक विश्वास नही रखते। किन्तु विश्वास न करने से कोई चीज झूठी नही हो जाती । हमे उस चीज की आवश्यकता को समझना आवश्यक है । आप हम सभी जानते है मनुष्य को उसके कर्मानुसार स्वर्ग अथवा नरक मिलता है । किंतु कई बार केई पाप इंसान से गलती से हो जाते है।जिस तरह हम किसी रास्ते पर चल रहे है और हमारे पैरो से कोई चीटी मर जाये, याफिर किसी गलतफैमि के कारण हमसे किसीका हृदय आहत न हो जाये। ये पाप तो है पर हमसे अनजाने में हो गए । लेकिन भलेही अनजाने मे हुए पर उसका फल तो हमे जरूर मिलेगा।जिस तरह एक झूठ कई झूठ बुलवाता है, उसी तरह एक पाप कई पाप करवाता है । और फिर इंसान के जीवन में दुख आता है । अब ऐसे पापो से कौन मुक्ति दिलाये ?
एक बार राधारानी ने देखा के धरती के लोग अत्यंत दुख पा रहे है । उन्हें धरती के लोगो पर बड़ी दया आई। तब गोलोक में जाकर उन्होंने प्रभु श्री कृष्ण से कहा , " हे प्रभु धरती के लोग संसार की माया में फसकर अत्यंत दुख पा रहे है । उन्हें इस दुख से मुक्ति कैसे मिलेगी ? उनका ये दुख देखकर मेरा हृदय आहत हो रहा है । तब श्री कृष्ण ने कहा " देवी धरती लोक मे लोग अपने कर्मो का फल भोगते है । और कर्मो के भोग से तो आज तक कोई नही बच पाया, ये तो आप जानती है । " राधारानी ने कहा,"जानती हूं नाथ, किंतु यदि ऐसा ही चलता रहा तो इन सबका कल्याण कैसे होगा, फिर तो ये सदैव कर्म करते और उसका फल भोगते रहेंगे । इन कर्मो के बंधनों से मुक्त अपने उद्धार के विषय में कैसे सोच पायेंगे, आप इनके प्रति उदार बनिये, इनके कल्याण का कोई तो मार्ग ढूंढ कर निकालिये"।उसपर प्रभु श्री कृष्ण ने कहा," आप की इच्छा का सम्मान करते है , देवी वैसा ही होगा जैसा आप चाहती है।" राधारानी प्रसन्न हो गयी।
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| राधाकृष्ण |
कुछ दिनों पश्चात एक राक्षस मुर ने स्वर्गलोग पर आक्रमण कर दिया। और वे लोग अपनी रक्षा के लिए ब्रम्हदेव के पास गए और ब्रह्मदेव उन सबको लेकर प्रभु श्री कृष्ण के पास गये। देवताओ की रक्षा हेतु भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के लिए सज्ज हुए।किंतु प्रभु के किसी प्रहार का उसपर कोई असर ही नही होता था। भगवान का सुदर्शन चक्र भी विफल हो कर लौटा। तब ब्रम्हदेव ने कहा,"इस राक्षस का वध केवल स्त्री कर सकती है, ऐसा वरदान मैने ही इसे दिया है।" और उस राक्षस ने प्रभु पर निद्रा अस्त्र चलाया। कान्हा को निद्रा आने लगी। तभी एक गुफा में जाकर निद्रस्थ हो गए। अब सबको चिंता हुई अब क्या होगा? हमारी रक्षा कौन करेगा? तब ब्रम्हदेव ने श्री कृष्ण की योगनिद्रा का आवाहन किया,उनसे विनती की,की वो बाहर आ जाये। तभी भगवान की वह योगनिद्रा अष्टभुजा धारी देवी के रूप मे बाहर आयी। और उस देवी ने उस असुर का अंत किया।
तब भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हो गए और उनसे वरदान मांगने के लिये कहा । तब देवी ने कहा,"मुझे आपकी भक्ति प्रदान करेवाली बनाईये, जो भी मेरा व्रत करे उनका कल्याण हो,उन्हें आपकी कृपा प्राप्त हो।"इसपर प्रभु श्रीकृष्ण ने कहा,"तथास्तु, तुम्हारे और मेरे भक्त एक ही होंगे, जो भी तुम्हारे व्रत का पालन करेंगे उन्हें मेरी भक्ति सहज में प्राप्त होगी,उनके अनेको जन्मो के पाप नष्ट होंगे, ब्रम्हहत्या जैसे पापो से मुक्ति मिलेगी।"
श्रीकृष्ण जब पुनः लौटकर आए तब उन्होंने राधारानी से कहा,"आपकी इच्छा पूर्ण हुई देवी, एकादशी व्रत करनेवाले लोगो के पाप नष्ट होंगे और मेरी भक्ति भी प्राप्त होगी।" राधारानी ने कहा,"इसका कोई उदाहरण दीजिये न।" श्रीकृष्ण ने कहा,"इसके कई उदाहरण होंगे किंतु सबसे बड़ा उदाहरण होंगे,"भक्त प्रल्हाद" राधारानी ने पूछा "वो कैसे" श्रीहरि ने कहा,"भक्त प्रल्हाद पूर्व जन्म में एक वैश्या का संग करेंगे और एक दिन उस वैश्या से रुष्ट होकर मंदिर में बैठ जाएंगे, उस दिन वे कुछ नही खायेंगे नही और वो दिन होगा एकादशी का और एकादशी व्रत के फलस्वरूप अगले जन्म में वो भक्त प्रल्हाद होंगे। राधारानी ने कहा,"प्रभु आपकी जय हो।"
ऐसी थी ये एकादशी व्रत की कहानी । एकादशी के दिन निराहार रहना चाहिए और यदि किसी कारणवश व्रत न कर सके तो कम से कम चावल नहीं खाने चाहिए। फल, दूध खा सकते है और सबसे आवश्यक बात निरंतर हरिजप करना चाहिए।
चलिए," जय सियाराम" "राधे राधे"
चलिए," जय सियाराम" "राधे राधे"


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