Importance of radha in krishna's life

 राधा का महत्व

              पहली पोस्ट में हमने देखा की श्रीदामा जी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। राधारानी को श्राप देकर वे भी अत्यंत दुखी हुए। क्योंकि वे जानते वास्तव थे, उन्होंने राधा को नही अपितु स्वयं अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण को श्राप दिया है। इसका अर्थ ये की यदि वियोग हुआ तो कृष्ण भी राधारानीसे नही मिल पाएँगे, तो वे भी अत्यंत दुखी रहेंगे उसीप्रकार जिसप्रकार दो प्रेमी हंसो के जोड़ेमेसे किसी एक को मार दो तो दूसरा स्वयं ही तड़प के मर जाता है। उन्हें अपने शब्दों पर बहुत पछतावा हुआ,इसीलिए वे प्रभु श्रीकृष्ण और राधारानी से माफी मांगने चले गए।
             उधर पिछली पोस्ट में हमने देखा कि कृष्ण राधा को मना रहे थे। राधाराणी कृष्ण के कंधे पर सर रखे थी।राधारानी जब भी कृष्ण की ओर देखती है, उन्हें बार बार श्रीदामा का श्राप स्मरण आ जाता और उनका मन उनसे कहता कि,"जल्द ही कृष्ण मुझे छोड़कर चले जायेंगे, मै किस प्रकार जी सकूँगी बिना कृष्ण के और कृष्ण किसप्रकार जी सकेंगे बिना अपनी राधा के" पर फिर मन कहता,"मुझे जितने भी दुख मिले, मैं सहन कर लुंगी पर मै अपने कृष्ण को तड़पता हुआ किस प्रकार देख सकती हूँ। मैं उनके वियोग में दुखी रहू, तड़पती रहू चलेगा पर मेरे लिए वे तड़पे, ये मैं सहन नही कर सकती।"  उनकी आखों से आँसू  बह चले और कृष्ण के कंधे पर आ गए | कृष्ण को इस बात को समझने में देर नहीं लगी की राधारानी व्यथित है | उन्होंने राधा को उठाया और उनके आँसू पोछे तब राधारानी अपने हाथ कृष्ण के कपोलो पर फेरने लगी  और मन ही मन प्रार्थना करने लगी,"हे ईश्वर मेरा कृष्ण जहा भी रहे खुश रहे, उसके जीवन में कभी कोई दुःख न हो, और यदि हो तो वो सारे दुःख मेरी किस्मत में आ जाये, और मेरे जीवन के सारे सुख उसकी किस्मत में चले जाये| मेरे जीवन में आनेवाले हर दुःख का यही परिणाम होना चाहिए  की मेरा कान्हा सर्वदा खुश रहे, यदि मेरे रोने से कृष्ण को ख़ुशी मिलती है तो हे ईश्वर मैं  सर्वदा रोती रहु और वो सर्वदा हसते रहे |" कृष्ण मन ही मन समझ गए की राधारानी उन्हें किस हदतक प्यार करती है|
radha love for krishna,radha love
कृष्णमयी राधा 
उन्होंने कहा राधे   "कभी तो खुद के लिए कुछ माँगा   करो सर्वदा मेरे लिए ही मांगती  रहती हो|"
राधा ने  कहा   " राधा का जीवन कृष्ण के लिए समर्पित हो चूका है और  जहा सर्वोच्च समर्पण होता है वहा प्रेमी अपने आपको भूल जाता है केवल अपने प्रेमी को याद रखता है | उसके लिए खुदका कोई अस्तित्व है क्योंकि वो अपने अस्तित्व को भूलकर किसी और के अस्तित्व में जीता है इसीलिए तो जगत कहता है राधाकृष्ण दो नहीं एक है | एक प्राण दो देह है | कृष्ण के लिए भलेही उनका कर्तव्य राधा से बढ़कर हो किन्तु राधा के लिए कृष्ण से बढ़कर ना कोई था, ना कोई है और ना ही कोई हो सकता है |"
कृष्ण की आखों से झर झर आंसू बहने लगे और वे बोले," राधे में तुम्हारे प्रेम के भर तले दबा जा रहा हूँ| मैंने समस्त जगत को उनकी तपस्या का फल दिया है  किन्तु तुम्हारी ये प्रेम की तपस्या इतनी गहरी है की मैं  क्या दू तुम्हे? वास्तव में तुम ही मेरी अगणित तपस्या के फलस्वरूप मुझे मिली हो , तुम बताओ में ऐसा क्या करू जीससे तुम्हे ख़ुशी हो, जिससे मैं  तुम्हारे इस प्रेम के कर्जे से मुक्त हो पाऊ?" 
राधा ने कहा," फल की इच्छा से किये जाने वाले किसी भी तपस्या का फल हो सकता है, किन्तु प्रेम इस तपस्या का कोई फल नहीं होता  क्योंकि प्रेम में किसी प्रकार का फल पाने की कोई इच्छा ही नहीं होती | प्रेम स्वयं ही एक बड़ी तपस्या का फल है, क्या माँ अपने बच्चे से प्रेम कोई फल पाने लिए करती है? नहीं,   वो अपने बच्चे से प्रेम करती है इसीलिए  निस्वार्थ सेवा करती है| और वैसे भी जिस प्रेम में कुछ पाने की इच्छा होती है वो प्रेम, प्रेम नहीं सौदा होता है| किस्मतवालो को ये प्रेम का फल मिलता है और मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए तुम मेरे हो मेरेलिए यही काफी है| "
कृष्ण ने कहाँ,    "नहीं राधे, तुम कुछ तो मांगो जिससे मुझे प्रसन्नता हो|"
राधा ने कहाँ,  "कृष्ण तुमसे कुछ भी मांगना ये मेरे प्रेम का अपमान है|"
कृष्ण ने कहा," नहीं राधे फिर तुम कुछ मांगों"
राधा ने  कहा, " ठीक है तुम सच में चाहते हो मैं तुमसे कुछ मांगू "
कृष्ण ने राधा का हाथ पकड़कर कहाँ, " हां राधे" राधा कृष्ण के सामने अपने घुटनो पर बैठ गयी और बोली "तुम सर्वदा प्रसन्न रहो कहना कान्हा मुझे और कुछ नहीं चाहिए क्योंकि तुम खुश रहोगे तभी मैं खुश रहूंगी, तो वचन दो सर्वदा प्रसन्न रहोगे" कृष्ण मौन हो गए कुछ कह ही पाए अब राधारानी खड़ी हो गयी उन्होंने अपना हाथ आगे करके पुनः कहा," क्या हुआ कृष्ण, बोलो ना, करोगे ना मेरी इच्छा पूरी" अब कृष्ण राधारानी के चरणों पर गिर गए और कहने लगे,"मत करो इतना प्यार राधे, मैं तो जी ही पाउँगा तुम्हारे बगैर और यदि तुम मेरे बिना दुखी रहोगी तो मैं  किस प्रकार खुश रह सकता हूँ, संसार मुझे क्या कहेगा?"
राधा ने कहा, " यदि तुम्हे ऐसा लगता है मेरे दुःख में तुम दुखी रहो तो मुझे ख़ुशी होगी तो ना तुमने अबतक प्रेम को समझा है और ना अपनी राधा को| प्रेम में इंसान खुदका रहता ही नहीं, तो उसकी अलग ख़ुशी कैसे हो सकती है, यदि तुम्हारा कर्तव्य पूर्ण करने में तुम्हे ख़ुशी मिलती है, तो तुम अपना कर्तव्य पूर्ण करो क्योंकि तुम्हारी ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है | " और राधारानी ने कृष्ण को उनकी बाहे पकड़कर उठा लिया | कृष्ण ने कहा," राधे तुम्हारा समर्पण सर्वोच्च है| मेरा वचन है जबतक कृष्ण का अस्तित्व इस ब्रम्हांड में  है तबतक कृष्ण सदैव राधा का ही रहेगा, मुझपर सदैव तुम्हारा ही अधिकार रहेगा, ये संसार सदैव कृष्ण को राधा का दास कहेगा,कृष्ण से पहले सदैव राधा का नाम  लिया जायेगा और जो ऐसा नहीं करेंगे उन्हें स्वप्न में भी मेरी कृपा प्राप्त नहीं होगी| किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु को जबतक राधा स्वीकार नहीं करेगी तबतक कृष्ण उसकी तरफ देखेंगे भी नहीं|" राधारानी विस्मित होकर कृष्ण को देखने लग गयी| तभी वहा प्रायश्चित से भरे श्रीदामा जी पधारे|
radharani
राधारानी 
आगे का अगली पोस्ट में," जय सियाराम" "राधे राधे"                

SHARE

Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments:

Post a Comment