राधाकृष्ण का प्रेम
राधा को श्राप मिलने के बाद वो अत्यंत दुखी अंत:करण से वापस आयी। उधर कृष्ण उनके पास आने का प्रयास कर रहे थे पर उन्हें अत्यंत भय हो रहा था, क्योकि वे जानते थे राधारानी अत्यंत क्रोधित है। कृष्ण बडा साहस जुटाकर राधारानी के पास गए। राधारानी उन्हें देखकर अत्यंत क्रोधित हो गयी और बोली," जहाँ से आए हो वही चले जाओ, तुम्हारी प्रेयसी नदी बन गई है अब तुम भी उसके साथ रहो, मै अकेली रह सकती हूँ चले जाओ यहां से"। कृष्ण समझ गए अभी कुछ भी कहना व्यर्थ होगा इसीलिए वे वहासे चले गए। राधारानी पुनः एकांत में चली गयी। कृष्ण जानते थे अभी राधारानी दुःखी है इसीलिए वे इतने कठोर शब्दो का प्रयोग कर रही है अन्यथा राधारानी कभी कठोरता पूर्वक बात नही करती उनका मन फूल की पंखुड़ी की भाती कोमल है। परंतु अब उन्हें मनाए कैसे क्योंकि इतनी आसानी से तो मानेंगी नही।
उधर राधारानी भी कृष्ण वियोग में कातर हो गयीं। किन्तु कृष्ण से कुछ भी कहने से उन्होंने अपनी सखियोको मना कर दिया था।पर कृष्ण तो अन्तर्यामी थे, वे जानते थे राधारानी की अवस्था कृष्णवियोग में अत्यंत दयनीय हो चुकी है,पर वे इतनी मानवती स्त्री है, ना स्वयं कुछ कहेंगी और न किसीको अपनी हालत बया करने देंगी। इसीलिए राधारानी तो आने को तैयार नही होंगी तो स्वयं ही राधारानी के पास चले गए।
कृष्ण राधारानी के समक्ष उपस्थित हो गए। राधारानी की हालत अत्यंत खराब थी, वे बेसुद अवस्था में थी, क्षण प्रति क्षण कृष्ण को देखना चाहती थी। और उसपर श्रीदामा का श्राप उन्हें बार बार स्मरण आ रहा था। उन्हें लगता था कही कृष्ण अभिसे मुझे छोड़कर ना चले गए हो। उस बेसुद अवस्था में जब राधा ने कृष्ण को अपने समक्ष देखा तो वे खुश भी हुई,साथ साथ दुखी भी हुई। उन्होंने कृष्ण से कहा," तुम यहाँ पर क्यो आये हो चले जाओ, वापस चले जाओ अपनी प्रिय पत्नी के पास, मेरे पास तुम्हारा काम ही क्या हैं? अब तुम्हे मुझसे मतलब ही क्या है? चले जाओ यहाँ से कृष्ण चले जाओ" उनका कंठ अवरूद्ध हो गया था, शरीर में कोई सामर्थ्य नही था। अब कृष्ण ने कहा,"मैं नही जाऊंगा, क्यू जाऊ, मेरी आत्मा, मेरा हृदय यहाँ निवास करता है तो मैं वहाँ जाकर क्या करूँ?"(यहाँ आत्मा,हृदय अर्थात खुद राधारानी) राधारानी हृदय से अत्यंत खुश हुई ये जानकर की कृष्ण अपनी राधा को भूले नहि। किंतु राधारानी ने पुन: कहा,"तुम यहाँ से चले जाओ कृष्ण, मैं तुम्हारा मुख भी नहीं देखना चाहती।" अब वे सखियोकि की सहायता से खड़ी हो गई। किंतु कृष्ण वहा से हिले भी नही, और उसपर मंद मंद मुस्कुराने लग गए उनकी उस मोहिनी मुस्कान पे तो जग मोहित होता है फिर राधारानी कैसे बच सकती थी। पर किसी तरह राधारानी ने स्वयं को संभाला और कहा "अब अगर तुम यहाँ से नही गए तो में खुद यहाँ से चली जाउंगी" कृष्ण फिर भी टस से मस नही हुए। अब राधाराणी बोल उठि "कैसे बेशर्म की भांति हँसे जा रहे हो मैं ही चली जाती हूँ" और वे वहाँ से जाने लगी, तब कृष्ण मार्ग में खड़े मुस्कुराने लग गए, अब उनकी वो मुस्कुराहट देखकर राधारानी क्रोधित भी हो रही थी और मन ही मन पिघल भी रही थी। राधारानी ने कहा,"रास्ते से हट जाओ कृष्ण, मुझे जाने दो।" कृष्ण ने कहा,"ठीक हैं, मैं तुम्हें जाने दूंगा, यदी तुम सच्चे हृदय से मेरी कसम खाकर कहो कि मैं तुम्हे कभीभी भूल सकता हूँ, तुम्हारा स्थान किसी और को दे सकता हूँ, तुम्हारे समान किसी और से प्रेम कर सकता हूँ।" राधारानी ने कुछ नहीं कहा क्योंकि वे जानती थी की, और सारी चीजें कृष्ण के जीवन में उनका कर्तव्य है किंतु राधा उनके लिए उनका प्रेम है। और वे राधा से अधिक और किसी से भी प्रेम नही करते है। राधारानी भीतर चली आई, उन्होंने बाकी सखियोसे वहाँ से चले जानेको कहा।
कृष्ण ने देखा कि राधारानी का क्रोध अब शांत हो रहा है, तब राधारानी का हाथ उन्होंने अपने हाथ मे लिया, उन्हें एक कोमल शय्या पर बिठाया और स्वयं उनके पैरों के पास बैठ गए। राधारानी के पैरो को अपने हाथों से सहराने लगे।राधारानी की आँखों से आंसू बहने लगे। कृष्ण ने कहा," राधे तुम जानती हो मैं इस दुनिया मे तुमसे अधिक प्रेम और किसी से भी नही करता हूँ, फिर भी तुम इतनी व्यथित हो जाती हो, विरजा तो तुम्हारा अत्यंत सम्मान करती है, किंतु वो मेरी पत्नी होने के नाते मुझसे प्रेम भी करती है, पर क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ इसीलिए वो अपने प्रेम को कभी जताती नहि, सदैव अपने प्रेम को मेरे खुशी पर कुर्बान करती है। क्योंकि वो
उधर राधारानी भी कृष्ण वियोग में कातर हो गयीं। किन्तु कृष्ण से कुछ भी कहने से उन्होंने अपनी सखियोको मना कर दिया था।पर कृष्ण तो अन्तर्यामी थे, वे जानते थे राधारानी की अवस्था कृष्णवियोग में अत्यंत दयनीय हो चुकी है,पर वे इतनी मानवती स्त्री है, ना स्वयं कुछ कहेंगी और न किसीको अपनी हालत बया करने देंगी। इसीलिए राधारानी तो आने को तैयार नही होंगी तो स्वयं ही राधारानी के पास चले गए।
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| राधा का शोक |
कृष्ण राधारानी के समक्ष उपस्थित हो गए। राधारानी की हालत अत्यंत खराब थी, वे बेसुद अवस्था में थी, क्षण प्रति क्षण कृष्ण को देखना चाहती थी। और उसपर श्रीदामा का श्राप उन्हें बार बार स्मरण आ रहा था। उन्हें लगता था कही कृष्ण अभिसे मुझे छोड़कर ना चले गए हो। उस बेसुद अवस्था में जब राधा ने कृष्ण को अपने समक्ष देखा तो वे खुश भी हुई,साथ साथ दुखी भी हुई। उन्होंने कृष्ण से कहा," तुम यहाँ पर क्यो आये हो चले जाओ, वापस चले जाओ अपनी प्रिय पत्नी के पास, मेरे पास तुम्हारा काम ही क्या हैं? अब तुम्हे मुझसे मतलब ही क्या है? चले जाओ यहाँ से कृष्ण चले जाओ" उनका कंठ अवरूद्ध हो गया था, शरीर में कोई सामर्थ्य नही था। अब कृष्ण ने कहा,"मैं नही जाऊंगा, क्यू जाऊ, मेरी आत्मा, मेरा हृदय यहाँ निवास करता है तो मैं वहाँ जाकर क्या करूँ?"(यहाँ आत्मा,हृदय अर्थात खुद राधारानी) राधारानी हृदय से अत्यंत खुश हुई ये जानकर की कृष्ण अपनी राधा को भूले नहि। किंतु राधारानी ने पुन: कहा,"तुम यहाँ से चले जाओ कृष्ण, मैं तुम्हारा मुख भी नहीं देखना चाहती।" अब वे सखियोकि की सहायता से खड़ी हो गई। किंतु कृष्ण वहा से हिले भी नही, और उसपर मंद मंद मुस्कुराने लग गए उनकी उस मोहिनी मुस्कान पे तो जग मोहित होता है फिर राधारानी कैसे बच सकती थी। पर किसी तरह राधारानी ने स्वयं को संभाला और कहा "अब अगर तुम यहाँ से नही गए तो में खुद यहाँ से चली जाउंगी" कृष्ण फिर भी टस से मस नही हुए। अब राधाराणी बोल उठि "कैसे बेशर्म की भांति हँसे जा रहे हो मैं ही चली जाती हूँ" और वे वहाँ से जाने लगी, तब कृष्ण मार्ग में खड़े मुस्कुराने लग गए, अब उनकी वो मुस्कुराहट देखकर राधारानी क्रोधित भी हो रही थी और मन ही मन पिघल भी रही थी। राधारानी ने कहा,"रास्ते से हट जाओ कृष्ण, मुझे जाने दो।" कृष्ण ने कहा,"ठीक हैं, मैं तुम्हें जाने दूंगा, यदी तुम सच्चे हृदय से मेरी कसम खाकर कहो कि मैं तुम्हे कभीभी भूल सकता हूँ, तुम्हारा स्थान किसी और को दे सकता हूँ, तुम्हारे समान किसी और से प्रेम कर सकता हूँ।" राधारानी ने कुछ नहीं कहा क्योंकि वे जानती थी की, और सारी चीजें कृष्ण के जीवन में उनका कर्तव्य है किंतु राधा उनके लिए उनका प्रेम है। और वे राधा से अधिक और किसी से भी प्रेम नही करते है। राधारानी भीतर चली आई, उन्होंने बाकी सखियोसे वहाँ से चले जानेको कहा।
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| कृष्ण राधा को मानते हुए |
कृष्ण ने देखा कि राधारानी का क्रोध अब शांत हो रहा है, तब राधारानी का हाथ उन्होंने अपने हाथ मे लिया, उन्हें एक कोमल शय्या पर बिठाया और स्वयं उनके पैरों के पास बैठ गए। राधारानी के पैरो को अपने हाथों से सहराने लगे।राधारानी की आँखों से आंसू बहने लगे। कृष्ण ने कहा," राधे तुम जानती हो मैं इस दुनिया मे तुमसे अधिक प्रेम और किसी से भी नही करता हूँ, फिर भी तुम इतनी व्यथित हो जाती हो, विरजा तो तुम्हारा अत्यंत सम्मान करती है, किंतु वो मेरी पत्नी होने के नाते मुझसे प्रेम भी करती है, पर क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ इसीलिए वो अपने प्रेम को कभी जताती नहि, सदैव अपने प्रेम को मेरे खुशी पर कुर्बान करती है। क्योंकि वो
चाहती है कि में सदैव खुश रहू, और मैं खुश तभी रहता हूँ जब तुम्हारे साथ रहता हूँ ।जबकि उसने भी मुझे प्राप्त करने हेतु बड़ी तपस्या की है, तो क्या भगवान होने के नाते मेरा कर्तव्य नही की मैं उसकी इच्छा को पूर्ण करू उसे उसकी तपस्या का फल,उसका अधिकार दु। वो तो स्वयं को तुम्हारी दासी समझती है। और मेरा तो वचन भी है, जो मुझे जिस भाव से प्रेम करते है, मैं उनको उसी रूप मे प्राप्त होता हूं। तो अब तुम ही बताओ कि मैं क्या करता।" राधारानी ने पूछा," तो वो स्वयं को मेरी दासी क्यों समझती है जबकि उसका अधिकार तो मेरे समान हुआ ना"। कृष्ण ने कहा,"क्योंकि मैंने ही उसकी तपस्या पूर्ण होने पर उसे दर्शन देते हुए कहा था कि मुझ पर सदैव मेरी स्वामिनी राधा का अधिकार रहेगा और उसका अधिकार मैं किसीको नही दूँगा।" तब उसने कहा,"मैं सदैव उनकी दासी बनकर अपना जीवन व्यतीत करूँगी कभी उनके समक्ष आप पर अधिकार नही जताउंगी, आपकी खुशी में ही मेरी खुशी है।" कृष्ण ने आगे कहा," इसीलिए वो कभी अधिकार नही जताती सदैव मेरे प्रेम की प्रतीक्षा करती रहती है,इसीलिये मैं उसके पास गया था, इसमें तुम्हारा अपमान करने की कोई मेरी कोई मंतशा नही थी फिर भी यदि मेरे कारण तुम्हे दुख हुआ हो तो मैं क्षमा चाहता हूँ" इतना कहकर कृष्ण ने अपने हाथ जोड़े, राधाराणी ने कृष्ण के हाथों को अपने हाथों से पकड लिया और उन्हें बड़े आदर और प्रेम के साथ अपने बगल में बिठाया। कृष्ण ने राधा के आंसू पोछकर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया।
आगे की कहानी अगली पोस्ट में ," जय सियाराम" " राधे राधे"
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