राधाकृष्ण प्रेम
प्रेम क्या है?
प्रेम एक आत्मिय संबंध है। अर्थात जो मनुष्य की आत्मा से जुडा है। संबंध तो इस दुनिया में अनेको हैं प्रेम का संबंध सारे संबंधों से परे है,जिसकी तुलना अन्य किसी भी संबंध से करना व्यर्थ है । सम्पूर्ण समर्पण ही प्रेम है । श्रद्धा और विश्वास ही प्रेम है। राधाकृष्ण ही प्रेम का वास्तिविक स्वरूप है। राधाकृष्ण जिनका नाम भी एक दूसरे से जुड़ा है,उन्हें कभी कोई अलग नही कर सकता क्योंकि उनकी आत्माए एक दूसरे से जुड़ी है।सर्वोच्च समर्पण का नाम ही है राधाकृष्ण।
कई लोग ऐसा प्रश्न करते है, राधा कृष्ण की कौन थी?क्या वो कृष्ण की सखी थी, या वो कृष्ण पत्नी थी, क्या संबंध था उन दोनों के बीच, जो आज भी संसार कृष्ण से पहले राधा का नाम लेता है। वो संबंध है प्रेम का। कृष्ण के हृदय की धड़कन है राधा। कृष्ण की आराध्या है राधा औऱ राधा के आराध्य है कृष्ण।कृष्ण की सबकुछ है राधा और राधा के लिए सबकुछ है कृष्ण। राधा के बिना कुछ नही है कृष्ण और कृष्ण के बिना कुछ नही राधा। कृष्ण के होटो की मुस्कुराहट है राधा, राधा कृष्ण की प्रेरणा है।कृष्ण का श्वास है इसीलिए राधा नही तो कृष्ण कुछ भी नही, और कृष्ण नही तो राधा कुछ भी नही। सच्चे प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है "राधाकृष्ण"। अब इतना प्रेम होते हुए भी क्यों कृष्ण और राधा का वियोग हो गया था, क्यों उन्हें विरह की गहरी पीडा का सामना करना पड़ा।
आपको हम सभी को ज्ञात है कि कृष्ण के अनन्य भक्त श्रीदामा के श्राप के करण राधाकृष्ण का वियोग हुआ। हुआ यूं, कृष्ण की तीन प्रमुख पटरानियां थी गोलोक में , राधारानी,विरजा और भूदेवी। राधारानी तो सबको ज्ञात है, विरजा अर्थात यमुना और भूदेवी अर्थात माता पृथ्वी। किंतु कृष्ण सबसे अधिक प्रेम राधरानी से करते थे।
एक बार कृष्ण विरजा देवी के महल में थे। तब राधारानी को उनकी सखी ने बताया कि श्रीकृष्ण विरजा के साथ है, क्रोध में आकर राधारानी वहा चली गयी। कृष्ण ने द्वार पर श्रीदामा जी को खड़ा किया था। राधाराणी को श्रीदामा ने भीतर जाने से रोका। अब राधारानी अत्यंत क्रोधित हो गई और श्री कृष्ण को बुरा भला कहने लग गयी। श्रीदामा जी उनके इस व्यवहार से अत्यंत क्रोधित हो गये, उन्होंने कहा," तुम्हे इस बात का अत्यंत घमंड हो गया है कि, कृष्ण तुमसे अत्यंत प्रेम करते है। वे तुम्हारी प्रत्येक बात का स्वीकार करते है। कृष्ण के उपर सारी सृष्टि मोहित होती है, और वे श्रीकृष्ण सदैव तुम पर मोहित होते है, तुम पर अपना सबकुछ न्योछावर कर देते है, इसीलिए तुम्हें अहंकार हो गया है अतः जाओ मै तुम्हे श्राप देता हूं, तुम्हारा श्रीकृष्ण से सौ वर्षो का वियोग हो जायेगा। जीन श्रीकृष्ण प्रेम का अभी तुम्हे महत्त्व नही , सौ वर्षो तक तुम्हे उस प्रेम के लिए तड़पना होगा।" उसपर राधारानी ने कहा,"तुमने राधाकृष्ण प्रेम को ना समझते हुए, राधाकृष्ण को अर्थात अपने माता पिता को भीन्न भिन्न माना है। वो राधाकृष्ण जिनके नाम तक एक दुसरे से भिन्न नही हो सकते। अतः हे अपने माता पिता में भेद करनेवाले तुम्हे मृत्युलोक मे राक्षस रूप में जनम लेना पड़ेगा।" और राधा राणी वहा से चली जाती है। राधा राणी को अपने ओर आते देखकर कृष्ण पहले ही अंतर्धान हो जाते है और देवी विरजा भय से पानी पानी होकर नदी बन जाती है। वो नदी गोलोक में विरजा है और धरतीलोक में यमुना कहाई गई।
अब कई प्रश्न होंगे आपके मन में
१) राधाराणी ने देवी होते हुए भी श्रीदामा को श्राप क्यों दिया?
२) कृष्ण राधा से प्रेम करते हुए विरजा के पास क्यों गये?
३) श्रीकृष्ण ने भगवान होते हुए श्रीदामा को श्राप देने से रोका क्यों नही?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर अगली पोस्ट मे, तब तक के लिए "जय सियाराम" "राधे राधे"
अब कई प्रश्न होंगे आपके मन में
१) राधाराणी ने देवी होते हुए भी श्रीदामा को श्राप क्यों दिया?
२) कृष्ण राधा से प्रेम करते हुए विरजा के पास क्यों गये?
३) श्रीकृष्ण ने भगवान होते हुए श्रीदामा को श्राप देने से रोका क्यों नही?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर अगली पोस्ट मे, तब तक के लिए "जय सियाराम" "राधे राधे"


0 comments:
Post a Comment