Shridama apologies to radha

वियोग क्यों ?

          श्रीदामा जी राधाकृष्ण के पास पधारे। उन्होंने राधाकृष्ण के चरणो में प्रणाम किया। राधाकृष्ण ने उन्हें आशिर्वाद दिया। दोनो ने कहा," कल्याण हो"। श्रीदामा जी के नेत्र भर आये। उन्होंने," हे युगल सरकार, जिसने स्वयं अपने ही माता पिता  को  अलग होने का श्राप दिया हो उसका कल्याण कैसे हो सकता है? मुझे बहुत ग्लानी हो रही है। कितना बड़ा पाप हुआ है मुझसे। राधाराणी ने मुझे उचित श्राप दिया है मुझे राक्षस होकर ही जन्म लेना चाहिए, यही मेरा दंड है। वैसे भी जो अपने माता पिता से द्रोह करे, वो दिखता भले ही इंसान हो किंतु वो होता राक्षस ही है।" कृष्ण और राधा ने अपने एक एक हाथ से उनकी बाहो को पकड़कर उन्हें उठा लिया। श्रीदामा ने कहा," हे माता मैं आपसे नजरे मिलाने योग्य नही रहा,इतना बड़ा पापी हूँ। पर माँ तो करुणामूर्ति होती है। अपनी संतान के पापो को अपने आँचल में छुपा लेती है,और माँ बाप की क्षमा पर तो संतान का अधिकार होता है, सो हे आदिपुरुष, हे आदिशक्ति आपकी क्षमा पर भी आपके इस पुत्र का अधिकार है ना , कृपा करके मुझे अपना अधिकार दिजिये, मुझे क्षमा कर दीजिए।" राधाकृष्ण ने एक साथ कहा,"तथास्तु"। श्रीदामा जी धन्य हो गए जो प्रभु ने उन्हें क्षमा कर दिया। तभी वहां सारे गोलोकवासी आ गए श्रीदामा जी ने कहा," जगदीश्वर भगवान श्रीकृष्ण की" सभी गोलोकवासीयोने एक साथ कहा,"जय"। श्रीदामा ने पुनः कहा,"जगतजननी, आदिशक्ति, कृष्णप्रिया देवी श्री राधारानी की" सभी एक साथ,"जय"

राधाकृष्ण की जय

श्रीदामा जी पुनः  राधारानी के चरणों में झूक गए उनके आँसुओ से राधारानी के चरण भीग रहे थे। राधारानी ने उन्हें उठाया और पूछा," अब तो तुम्हे क्षमा कर दिया ना, और क्या चाहिए? सच पूछो श्रीदामा तुम्हे श्राप देकर मेरे हृदय को भी बहूत पीड़ा हुई, तूम तो केवल अपने स्वामी के प्रति अपना दायित्व निभा रहे थे, उनकी आज्ञा का पालन कर रहे थे और मैंने तुम्हें श्राप दे दिया, किंतु इस सृष्टि में जो कुछ होता है कृष्ण की इच्छा से ही होता है, अब इस बात के पीछे का काऱण श्रीकृष्ण ही बता सकते है, दोनो ने श्रीकृष्ण की ओर देखा, कृष्ण मुस्कुराने लग गए। कृष्ण ने कहा,"श्रीदामा तुम चिंता ना करो, तुम राक्षस रूप में जनम अवश्य लोगे किंतु मैं स्वयं मनुष्य रूप अवतार लेकर, तुम्हे मारकर तुम्हारा उद्धार करूँगा और तुम पुनः गोलोक में वापस लौट आओगे।" श्रीदामा प्रसन्न हो गए। राधा ने पूछा,"कृष्ण मेरा क्या?, मुझे जो श्राप मिला है उसका क्या तात्पर्य है?" कृष्ण ने कहा," राधे तुम तो जानती हो प्रेम की भावना को, राधाकृष्ण तो प्रेम की प्रतिमूर्ति है, ये बात गोलोकवासीयोको ज्ञात है किंतु धरतीवासियो को कौन बताएगा प्रेम का अर्थ क्या है? आजतक जितने भी ईश्वरीय अवतार हुए है सभी पति पत्नी के संबंध है, अर्थात उन सबने संबंध में प्रेम को दर्शाया है, किंतु प्रेम केवल संबंध में हो ये जरूरी नहीं है। प्रेम में संबंध का होना जरूरी नही है, परंतु संबंध प्रेम का होना अत्यंत आवश्यक है। और जहाँ संबंध प्रेम होता वहा वो प्रेम मर्यादित होता है, इसका अर्थ हम उन्हींसे प्रेम कर सकते है, जिनका हमसे कोई न कोई संबंध होगा। परंतु राधे प्रेम में कोई मर्यादा नही होती, प्रेम तो हर मर्यादा से परे है, हर संबंध से परे है, शारीरिक नही अपितु हृदय और आत्मा से जुड़ा रिश्ता है। यही बात राधा और कृष्ण इस समस्त जगत को समझाएंगे। हमारा वियोग तो होगा, किंतु वो वियोग धरतीवासियो को प्रेम का एक सच्चा उदाहरण देकर जाएगा। कई बार लोग विवाह तो कर लेते है पर उनमें प्रेम नही होता। ऐसा विवाह केवल बंधन है, प्रेम नही।" राधा ने पूछा," अर्थात तुम मुझे छोड़कर किसी और से विवाह करोगे?" कृष्ण ने कहाँ," हा राधे, मेरे अनेको विवाह होंगे। वो सभी स्त्रियाँ जिन्होंने श्रीराम अवतार में मेरी पत्नी होने की इच्छा प्रगट की थी वो मेरे इस कृष्ण अवतार में मेरी पत्निया होंगी। और मैं उन सबकी इच्छाओं को पूर्ण करूँगा, किंतु मेरा मन और आत्मा सदैव तुम्हारे पास ही रहेगी। एक बात सदैव याद रखना राधा मेरे जीवन में चाहे जितनी भी स्त्रियां आये किंतु तुम्हारा स्थान न कभी किसीको मिला है, और ना भविष्य में कभी किसीको मिलेगा। कृष्ण के लिए राधा सर्वोपरि है। सारा विश्व कृष्ण के अधीन है और कृष्ण स्वयं राधा के आधीन है।" राधा ने कहा," मैं तुम्हारे बिना मर जाउंगी कान्हा।" कृष्ण ने कहाँ," नही,  ऐसा मत करना राधा, मेरे प्राण तुममे निवास करते है यदी तुम्हे कुछ हुआ तो मैं भी" उसी समय राधारानी कृष्ण के होटो पर हाथ रख देती है और कहती है," बातो में उलझाना तो कोई तुमसे सीखे, तुमसे तो कोई कभी जीत ही नही सकता।" कृष्ण ने कहा,"राधे ये झूट नही वास्तविकता है, जो मेरे हृदय में है वो ही मेरे होटो पर है।" अब दोनों मुस्कुराने लग गए किन्तु मुस्कान के भीतर आनेवाले वियोग का भय स्पष्ट दिख रहा था। राधा ने पूछा," वियोग के पश्चात किसके सहारे जियेंगे हम।" कृष्ण ने कहा,"प्रेम ही हमे शक्ति देगा उस वियोग को सहने की" दोनो फिर मुस्कुराने लगते है। श्रीदामा जी उन्हें प्रणाम कर के चले जाते है।
राधाकृष्ण प्रेम
             अब भगवान श्रीकृष्ण के धरती पर जनम लेने की तिथि निकट आ रही थी। सभी प्रतीक्षा कर रहे थे अपने तारणहार की। अब धरती पर जल्द ही बजने वाली थी कृष्ण की बाँसुरी की मधुर तान।
             चलिए अगली पोस्ट में करेंगे कृष्ण का धरती पर स्वागत और सुनेंगें राधाकृष्ण की प्यारी प्यारी लीलाओ को, तब तक के लिए,"जय सियाराम""राधे राधे"
           

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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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