Krishn janam

                                                                      कृष्णजन्म    
                    
                   राधारानी को कृष्ण से पहले धरती पर अवतार लेना पड़ा| किंतु राधारानी ने कृष्ण से एक वचन लिया की अवतार लेने के पश्चात वो अपनी आखें तब तक नहीं खोलेंगी जब तक कृष्ण स्वयं धरती पर आकर  उन्हें दर्शन नहीं देते | और राधारानी ने धरती की ओर प्रस्थान किया| राधारानी कृष्ण से ११ महीने बड़ी थी | राधारानी के माता पिता का नाम कीर्तिदा और वृषभान था |  और अब कृष्ण की बारी थी|
          आखिर वो घडी आ ही गई जब जगदीश्वर भगवान  श्रीकृष्ण इस धरा पर अवतार लेने वाले थे| पर अवतार लेने से पूर्व उसकी आवश्यकता को जानना आवश्यक है | धरती पर उस दुष्ट कंस का आतंक मचा हुआ था | चहु और लोग त्राहि त्राहि कर  रहे थे| ऋषियों के यज्ञ को विफल किया जा रहा था | हर जगह ऋषिमुनियों की निर्मम हत्या की जा रही थी|  सभी प्रभु से विनती कर रहे थे की वे उन्हें इस संकट से उबारे,उस पापी कंस का वध करे| कंस अपनी बेहेन  देवकी से अत्यंत प्रेम करता था| उनकी बेहेन  देवकी का विवाह वसुदेव जी से होने वाला था | कंस अपनी बेहेन  से इतना प्रेम करता था की वो स्वयं ही अपनी बेहेन के विदाई के रथ का सारथी बन गया| कुछ दुरी पर जाकर ही आकाशवाणी हुई," हे दुष्ट कंस जिस बेहेन का सारथी बन के तू उसे ले जा रहा है, उसी बेहेन का आठवा पुत्र तेरा काल होगा"| आकाशवाणी सुनकर कंस माता देवकी को मारने का प्रयत्न करता है, किंतु वसुदेव जी उसे ऐसा करने से रोकते है और उसे ये आश्वासन देते है के वे अपने पुत्र को जन्म लेते ही उसे सौप देंगे| कंस उन दोनों को कारागार में डाल देते है | 
kans
दुष्ट कंस 

                     अब चलते है गोकुल जहा नटखट नटवरलाल की लीलाओ का प्रादुर्भाव होने वाला था | गोकुल के मुखिया थे नंदबाबा, और उनकी पत्नी थी यशोदा|  वैसे तो वे दोनों अपने दांपत्य जीवन में बहुत सुखी थे, परन्तु एक ही दुःख था उन्हें,  उनकी कोई संतान नहीं थी| संतानप्राप्ति के अनेको प्रयास करने के बाद भी उन्हें विफलता ही प्राप्त हो रही थी| पर कहते है भगवान् जब भी देर से देते है, तो कुछ अच्छा ही देते है, उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ| एक बार माता यशोदा को एक स्वप्न आया एक छोटासा बालक गायों  के बिच में लेटा  हुआ है, और सभी गाये उसके मुख को चाट रही है, और नन्हा सा बालक अपने मुख में बांसुरी लिए लेटा  है| जब वात्सल्यमूर्ती  माता यशोदा उसके निकट गई,तब उस बालक ने प्रेम से पुकारा "मैया"| इतने सूंदर बालक के मुख से मैया ये शब्द सुनकर माता यशोदा मंत्रमुग्ध हो गई|  उन्होंने जैसे ही उस बालक को छूने की कोशिश की उनकी नींद खुल गई | तब ब्रम्हमुहूर्त की बेला थी| माता यशोदा ने नन्द जी को जगाकर  उन्हें अपना स्वप्न बताया|  नन्द जी ने  कहाँ, " निश्चय ही ये कोई शुभ संकेत है, लगता है जल्द ही प्रभु हमारी झोली भरने वाले है|" उधर मथुरा में कंस माता देवकी के छह पुत्रो की हत्या क्र चूका था, सातवे गर्भ में स्वयं शेषनाग माता देवकी के गर्भ में आए |  किन्तु प्रभु की आज्ञा से देवी योगमाया ने उन्हें माता देवकी के गर्भ से निकालकर माता रोहिणी, जो वसुदेव जी ही एक पत्नी थी उनके गर्भ में संकर्षित कर  दिया| माता रोहिणी उस समय सुरक्षा हेतु नन्द जी के यहाँ ही रह रही थी | कुछ महीनो पश्चात शेषनाग, अर्थात बलराम, अर्थात हमारे दाऊभैया जी का जनम हुआ| सभी के अस्थिर हृदय को शांति प्राप्त हुई| पर राधारानी की ही भाती बलराम जी ने भी अपनी आँखें नहीं खोली क्योंकि वो भी सर्वप्रथम अपने आराध्य का ही दर्शन करना चाहते थे | अब बारी थी माता देवकी के आठवे बालक की, सभी जिस के लिए प्रतीक्षारत थे| ये सारी सृष्टि जिनके आगमन के लिए आस लगाए बैठी थी| और जल्द ही भगवान् श्रीकृष्ण उस कारागृह में इस धरती पर अवतरित हुए| उस समय माता देवकी और वसुदेव जी निद्रा में थे| सारी सृष्टि आनंद से भर उठी | मध्यरात्रि का समय था| ब्रह्मदेव  सहित सभी देवताओ ने भगवान् की स्तुति की| उनपर पुष्पवृष्टी की| सारे कारागृह में एक प्रकाश सा फ़ैल गया |  प्रभु ने अपने   सभी भक्तो को अपने  आगमन मंगल संकेत दिए |   
krishna darshan
कृष्ण दर्शन 

               कृष्ण के अवतार का शंखनाद राधा को भी सुनाई दिया, पालने झूल रही नन्ही सी राधारानी आनंदविभोर हो गयी और मन ही मन कहा बोली," धरती पर आपका स्वागत है प्रभु, अब जल्द ही चले आइये मेरे पास "| नन्हे कृष्ण ने कहा, "अवश्य राधे"| अब सभी देवता स्तुति करके चले गए |  अब माता देवकी की निद्रा भंग हो गई और उन्होंने देखा की उनका गर्भ खली हो चूका है, चहु और पुष्प पड़े है और बगल में एक नन्हा सूंदर सा बालक हस रहा है | वसुदेव जी की भी निद्रा भंग हो गई | दोनों ही उस शिशु को देखके आनंदविभोर हो गए| उसी समय श्रीकृष्ण अपने  चतुर्भुज नारायण रूप में  वहा प्रगट हो गए और उन्होंने माता देवकी और वसुदेव को उनके पूर्व जनम की तपस्या का स्मरण कराया, और कहा की उसीके फलस्वरूप वे उनके यहाँ पुत्र रूप में अवतरित हुए है और अब बिना विलंब किये वो उन्हें गोकुल छोड़ आये| प्रभु अंतर्धान हो गए| माता देवकी ने बड़े ही कष्टपूर्वक अपने अभी जन्मे पुत्र को गोकुल में छोड़ आने की आज्ञा दी| उनका मन अपने पुत्र को बार बार निहारने को के रहा था| वसुदेव जी उस पुत्र को अपनी बाहो में उठाये वहा  से जाने लग गए | जैसे ही उन्होंने बालक को हाथ में लिया सारे ताले खुल गए| सभी सैनिक मूर्छित हो गए| अब वसुदेव जी यमुना नदी के किनारे आ गए, उन्हें यमुना पार करके गोकुल जाना था, और यमुना  नदी  में  भयंकर उफान आया था| आप याद होगी वो विरजा वही धरती पर यमुना बनकर बेह रही थी | अब देवी यमुना का हृदय अपने कृष्ण से मिलने के लिए लालायित हो रहा था| भीषण वर्षा हो रही थी| वसुदेव जी ने कृष्ण को एक टोकरी में डालकर यमुना में प्रवेश किया | कृष्ण एक छोटे बालक के रूप में थे, और उस भयंकर वर्षा में भीग रहे  थे तभी वहा शेषनाग पधारे और उन्होंने प्रभु को अपने फनो का  छत्र दिया | वसुदेव जी पूर्णरूपसे  यमुना में डूब चुके थे | भगवान् समझ गए यमुना को उनके चरणस्पर्श की इच्छा है इसिलए वे अधीर हो रही है | तभी प्रभु ने अपने चरण यमुना में डुबाये और देवी यमुना शांत हो गई | तभी बड़ी सरलता के साथ वसुदेव जी कृष्ण को यमुना पार ले आये | अब राधारानी कृष्ण दर्शन के लिए कातर हो उठी, और उनकी आत्मा उस शरीर को  छोड़कर कृष्ण दर्शन के लिए  दौड़ उठी| राधारानी ने आत्मारूपसे कृष्ण का दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया, कृष्ण ने राधा से कहा, "राधे में यहाँ केवल तुम्हारे लिए आया हूँ, ताकि जीवन के कुछ पल तो तुम्हारे साथ आनंद से बिता सकूँ| " राधारानी ने कहा," मैं धन्य हुई प्रभु, मुझसे मिलने शीघ्र बरसाना आइयेगा, मैं प्रतीक्षा करुँगी | "  कृष्ण ने कहा,"अवश्य राधे "

आगे का अगली पोस्ट में, "जय सियाराम" "राधे राधे"   
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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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