True Happiness of life part 2

                                         सच्चा सुख

चलिए आगे की कहानी सुनते है | 

                      वो राजा और संत बार बार उन सभी भक्तो को वो ही प्रश्न पूछते है पर वो  लोग तो केवल " हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे " यही रट रहे थे | और राजा के ऐसा प्रश्न करने पर उनमेसे एक भक्त ने उनके कपोलो को स्पर्श किया और कहा " भैया हरी बोल " और ख़ुशी से नाचने लग गया | तब उस संत ने राजा से से कहा " देखा राजन जिसे सच्चा सुख मिल जाता है वो कभीभी दुखी नहीं होता और न ही किसी और को दुखी देख सकता है | भक्त तो सदैव यही चाहता है की सबके जीवन में भगवान का रस आये ताकि सब सुखी हो सके | तब राजा ने कहा की " सचमुच प्रभु के नाम में इतना सुख है की इंसान को कोई दुःख होता ही नहीं | उसपर संत जी ने कहा " राजन ये संसार है और संसार होता ही दुःख देने के लिए है | यहाँ कोई सुखी नहीं है | इसीलिए इसे दुखालय कहा जाता है किन्तु भगवान का नाम अनंत सुख की पूंजी है और वो सदैव किस्मतवालो को मिलती है | राजा ने पूछा " प्रभु के नाम में ऐसा क्या है जो लोग इतने मस्ती में आ जाते है? संत जी ने कहा " राजन भगवान् के नाम में भगवान् खुद मौजूद है , शक्कर का नाम लेने से शक्कर नहीं मिल जाती अथवा गुड़ नाम लेने से गुड़ नहीं मिल जाता किंतु ईश्वर का नाम एकमेव ऐसी वस्तु है जिसमें नामी मौजूद है भगवान् स्वयं मौजूद है | राजा ने कहा " इसका अनुभव में किस प्रकार कर सकता हूँ ?" संत जी ने कहा " केवल गुरु कृपा से ही उस सुख का अनुभव किया जा सकता है," गुरु कृपास्य केवलंम शीषस्य परम मंगलम " शिष्य का परम मंगल गुरु कृपा से ही हो सकता है | राजा ने कहा "हे संतश्रेष्ठ आप ही ने मुझे ज्ञान दिया अब आप ही मेरा शिष्य के रूप में स्वीकार करे और मेरा कल्याण करे ।" संत जी ने कहा " तथास्तु राजन आजसे तुम मेरे शिष्य हुए और तुम्हारे कल्याण की जिम्मेदारी सर्वस्वी हमारी हुई। " ऐसा कहकर संत जी ने उनके कान में गुरुमंत्र कहा और कहा " आज से तुम्हारा जीवन ईश्वर को समर्पित हुआ ।"

ऐसा कहकर राजा के सर पे हाथ रखा और जैसे ही सरपे हाथ रखा राजा ने अपने अंत: करन मे प्रभु की लीला का दर्शन किया उन्होंने देखा कि यमुना के तट पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण बांसुरी बजा रहे है । जब राजा उनके पास पहुँचे को कान्हा ने बाहे फैलाकर उनका स्वागत किया । राजा का मन गदगद हो गया और उनकी आंखों से आनंदाश्रु बहने लगे तब श्रीहरि ने स्वयं उनके आँसू पोछे और उन्हें पुनः गले लगाया । राजा की वाणी स्तब्ध हो गयी वो कुछ भी केहने में समर्थ नही था । प्रभु ने कहा " आने में इतनी देर लगा दी वत्स इतने जन्म संसार करते हुए कभी हमारी याद नही आई । अब आये हो, तो कभी छोडके मत जाना।" राजा ने पुनः रोते रोते कहा ," प्रभु जो आपका हो जाए वो दुनिया का कहा रह जाता है, हे प्रभु ये जो प्रेम संबंध मेरे गुरुवर ने हम दोनो के बीच बनाया है इसे कभी मत तोडना, मूझे सदैव अपनी प्रेममयी सेवा प्रदान करना अपने सच्चे भक्तों का संग देना " प्रभु ने कहा   " तथास्तु"  
राजा ने अपनी आँखे खोली सामने अपने गुरुदेव को देखा चरणों में दंडवत प्रणाम किया और कहा " हे गुरुदेव कृपा करके आपके ऐसी कृपा मुझ दास पर सदैव बनाये रखना मुझे कभीभी अपनी सेवा से वंचित मत रखना । आज आपकी वजह से मैंने वो पाया जिसे प्राप्त करना असंभव था । मै सारे दुनिया का ही राजा क्यों न बन जाऊं पर जबतक मेरे पास राम नाम का धन नही तब तक मैं निर्धन ही हूँ । ये एहसास मुझे कराने के लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद , आज मैंने जाना कि सच्चा सुख क्या होता है । संत जी ने कहा "तो फिर जाओ उन भक्तो के साथ मिलकर प्रभु का गुणगान करो तुम्हारा कल्याण होगा ।" ऐसा कहकर संत चले गये और वो राजा "हरि बोल हरि बोल " कहकर अपने नैनो मे कृष्ण की छवि को बिठाकर झूमझूम कर नाचने लग गया ।

चलिए " जय सियाराम" " राधे राधे"
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Milan Tomic

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