राधा कृष्ण की पहली भेट
वृषभान जी नन्दमहोस्तव में सम्मेलित होकर अपने घर पुनः लौट आये| उनका हृदय ये सोचकर अत्यंत दुखी रहता था की उनकी पुत्री ने अबतक अपनी आँखे नहीं खोली | सब कहते थे की ये पुत्री नेत्रदोष के साथ जन्मी है | किंतु कोई नहीं जनता था की ये बीमारी तो प्रेम की है | राधारानी अपने प्रियतम की प्रतीक्षा कर रही थी| उनकी राहों में पलके बिछाये खड़ी थी | उधर कृष्ण का मन भी नंदभवन में नहीं लग रहा था| उन्हें भी अपने राधारानी की याद सता रही थी | तभी नन्द महाराज और माता यशोदा के मन में ये खयाल आया के वह वृषभान जी की पुत्री को भी देख आये | इसीलिए वह कृष्ण को लेकर बरसाना चले आए , अब कृष्ण का मन आनंद से भर उठा | नन्द जी बरसाना पहुंच गए, वहा वृषभान जी ने उनका भव्य स्वागत किया | राधारानी अपने पालने में सो रही थी, किंतु जैसे ही कृष्ण के आने की उन्हें आहाट लगी उनका हृदय कम्पित हो उठा | वे समझ गयी कृष्ण पधारे आज उनके द्वार पर प्रथम बार | बाहर नन्द जी और वृषभान जी की चर्चा चल रही थी| कृष्ण मैया के गोद में थे | अब कृष्ण ने देखा सभी लोग बातो में व्यस्त है कोई उन्हें राधा की तरफ लेकर ही नहीं जा रहा |
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| राधाकृष्ण |
उधर राधारानी भी अधीर हो रही थी कृष्ण से मिलने के लिए| तब लीलाधारी ने पुनः लीला की, अपना वही पुराना अस्त्र चलाया, रोने का अस्त्र | वे जोर जोर से रोने लग गए | मैया यशोदा उन्हें संभालने लगी | अब कृष्ण तो शांत ही नही हो रहे थे , और बार बार राधारानी के पालने की ओर इशारा करने लग गए| तब माता कीर्तिदा ने कहा," शायद कृष्ण को निद्रा आ रही होगी , इसलिए आप इसे राधा के बगल में लेटा दीजिये| माता यशोदा ने कृष्ण को राधा के बगल में लेटा दिया | देखते ही देखते कृष्ण का रोना बंद हो गया | और फिर निद्रा का ढोंग करने लग गए | माता यशोदा को लगा की कृष्ण सो रहे है इसीलिए वे उन्हें वही छोड़कर बाहर चली आयी | अब जैसे ही वे चली गयी कृष्ण ने राधा की ओर देखा, राधारानी को भी कृष्ण के स्पर्श का अनुभव हुआ, दोनों के नैनो से अश्रुधारा बहने लग गयी | कृष्ण ने अपने एक हाथ से राधा के हाथ को पकड़ा और दूसरा हाथ उनके माथे पर रखा, और उसी समय राधारानी ने अपनी आखें खोल दी| दोनों एक दूसरे को देखकर निहाल हो गए | राधारानी के आनंद की तो सीमा ही नहीं रही |
राधारानी ने कहा,"प्रभु आपने इस गरीब की कुटिया पर पधारकर मुझे और मेरे माता पिता को आपने धन्य कर दिया, आपका स्वागत है| "
कृष्ण ने कहाँ, " राधे मेरे मन ने मुझे यहाँ आने पर विवश कर दिया, जिस प्रकार एक भवरा फूल की ओर खींचा चला जाता है, उसीप्रकार मेरा मन भी तुम्हारी ओर खींचा चला जाता है |"
राधा ने कहा," ये तो आपकी महानता है | "
कृष्ण ने कहा," ये मेरी महानता नहीं तुम्हारे प्रेम की माया है जो तुमने मुझपर की है| "
राधा ने कहा, " अच्छा ! मैंने माया की है, और तुमने जो मेरा मन चोरी किया है उसका क्या? "
कृष्ण ने कहा," मैं कभीभी चोरी नहीं करता राधे वही चीज लेता हूँ जिसपर मेरा अधिकार होता है |"
कृष्ण राधारानी को चिढ़ाते हुए कहते है, " तुम ही तो कहती हो न हे...... प्रियतम मेरा तन, मन, धन सब तुम्हारा है | फिर यदि तुम्हारा मन मेरा ही है, तो फिर चोरी कहे की |"
राधा ने कहा, "और यदि में तुम्हे ये मन न दूँ तो क्या करोगे?"
कृष्ण ने कहा, " एक बात याद रखना मेरी प्रिय राधे, जिस चीज पर कृष्ण का अधिकार होता है यदि वो चीज उसे सीधी तरीकेसे न मिले तो कृष्ण उस चीज को चुरा लेते है | "
राधा ने कहा, " अर्थात आप चोरी करेंगे, संसार आपको चोर कहेगा|"
कृष्ण ने कहा, " राधे संसार का क्या है, यहाँ जितने मुख उतनी बाते, पर जो प्रेम करते है वे संसार की चिंता नहीं करते| मुझे कोई और क्या सोचता है इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता केवल जो लोग मुझसे प्रेम करते है वो क्या सोचते है इस बात से फर्क पड़ता है| "
राधा ने कहा, " तुमसे बातों में जित पाना असंभव है | "
उसी वक़्त सभी लोग वहां पहुंच गए | राधारानी आखें खुली देखकर उनके माता पिता के आनंद की सीमा नहीं रही|
उन्होंने कहा, " आपका कृष्ण एक दिव्य बालक है | "
और मैया यशोदा कृष्ण को लेकर जाने लग गयी
राधा ने कहा, " आपसे पुनः मिलन की प्रतीक्षा रहेगी| "
कृष्ण ने कहा, " मुझे भी राधे | "
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| राधा ने आँखें खोली |
राधाकृष्ण की प्यारी लीलाये अगली पोस्ट में," जय सियाराम" " राधे राधे "


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